अजब गजब

अनोखी परंपरा, लाखों के गहने पहन कर महिलाएं जाती हैं जंगल !

rajasthan

नई दिल्ली(रिपोर्ट अड्डा): हमारे देश में कई तरह की परंपराएं हैं। हर राज्य में लोगों की अलग अलग मान्यताएं और परंपराएं होती हैं। कई बार इन परंपराओं के नाम पर लोगों को काफी तकलीफ भी होती है। हर धर्म की अपनी परंपराएं होती हैं। इसी कड़ी में हम आपको बताने वाले राजस्थान की एक अनोखी परंपरा के बारे में। इस परंपरा के बारे में सुनकर लोग हैरानी जताते हैं। राजस्थान को खेजड़ली गांव में सालों से महिलाएं सोने के लाखों रूपये के गहने पहन कर जंगल में जाती हैं। सबसे खास बात ये है कि भारी भरकम गहने पहन कर जंगल में जाने के बाद भी आज तक लूटपाट की कोई घटना नहीं हुई है।

हर साल की तरह इस बार भी यहां की महिलाओं ने इस परंपरा का पालन किया। कई महिलाएं गहने से लदी हुई जंगल गई और फिर वापस आ गई। अब हम आपको इस परंपरा के बारे में जानकारी देते हैं। दरअसल 230 साल पहले पेड़ों को बचाने के लिए शहीद हुए 363 लोगों को आज भी बिश्नोई समाज नमन करता है। उसी के लिए इस मेले का आयोजन किया जाता है। मेले में बिश्नोई समाज के हजारों लोग पेड़ों की खातिर शहीद होने वाले लोगों को याद करते हैं। इस मेले में बिश्नोई समाज की महिलाओं में ज्यादा से ज्यादा गहने पहनने की होड़ लगी रहती है।

कई महिलाओं ने तो एक किलो तक सोने के गहने पहने थे। लोगों का कहना है कि ये परंपरा सालों से चली आ रही है। इस मेले के जरिए हम प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों को याद करते हैं और पेड़ों को बचाने के लिए शहीद हुए लोगों को नमन करते हैं। यहां पर महिलाएं सालों से इसी तरह से गहने पहन कर आ रही हैं। आज तक एक भी लूट की घटना नहीं हुई है। गहने गायब नहीं होते हैं. बिश्नोई समाज के लोगों का कहना है कि मेले में आने के बाद लोगों की भावनाएं पूरी तरह से बदल जाती हैं। ये मेले का सकारात्मक असर है। यहां पर कोई चाहकर भी गहने चोरी करने या लूटने की नहीं सोच सकता।

मेले में महिलाएं केवल गहनों का प्रदर्शन ही नहीं करती हैं। बल्कि वो पर्यावरण की सुरक्षा के लिए भी काम करती हैं। महिलाओं की अगुवाई में ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने का कार्यक्रम चलाया जाता है। इसी के साथ पॉलिथीन का त्याग करने की अपील भी की जाती है। बता दें कि 1787 में जोधपुर के महाराजा अभयसिंह ने मेहरानगढ़ में फूल महल का निर्माण शुरू किया था। इसके लिए लकड़ियों की जरूरत पड़ी तो इसी गांव से कई पेड़ काट डाले गए थए। बिश्नोई समाज ने इसका विरोध किया और पेड़ों को बचाने के लिए उनके आगे खड़े हो गए, लेकिन रााजा के सेवकों ने उन लोगों के हाथ काट दिए थे। पेड़ों को बचाने के लिए साठ गांवों के 217 परिवार के 294 पुरुष, 65 महिलाएं विरोध करने पहुंचे। राजा के सैनिकों से सभी को मार दिया था। उसके बाद राजा ने कहा कि कभी भी इस गांव से पेड़ नहीं काटा जाएगा। उसी की यााद में यहां पर हर साल मेला लगता है।

Advertisement

रिलेटेड कंटेंट के लिए नीचे स्क्रॉल करे..

Loading...
Advertisement

Leave a Comment