नाथूराम गोडसे का आखिरी बयान

नई दिल्ली(रिपोर्ट अड्डा): नाथूराम गोडसे का जिक्र करते ही एक छवि उभर कर आती है। ये छवि वो है जिसे एक हत्यारा माना जाता है। जिसनेे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या की थी। हालांकि आजतक इस बात को लेकर विवाद होता रहता है कि गोडसे ने गांधी को गोली क्यों मारी थी इसका सही कारण सामने नहीं आ पाया है। हालांकि नाथूराम गोडसे के कई पत्रों और उनके आखिरी बयान से इस बारे में कुछ संकेत जरूर मिलते हैं। आज हम आपको नाथूराम गोडसे का आखिरी बयान दिखाएंगे। बता दें कि नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को गांधी को की हत्या की थी। उसके बाद वो फरार नहीं हुआ था। कहा जाता है कि नाथूराम गोडसे का आखिरी बयान सुनकर अदालत में सङी लोगों के आंसू निकल गए थे। एक जज ने तो यहां तक कहा था कि अगर अदालत में मौजूद जनता को ज्यूरी बना दिया जाए तो गोडसे पूर्ण बहुमत से निर्दोष साबित होंगे।

नाथूराम गोडसे का आखिरी बयान कुछ इस तरह से था। सम्मान ,कर्तव्य और अपने देश वासियों के प्रति प्यार कभी कभी हमें अहिंसा के सिद्धांत से हटने के लिए मजबूर कर देता है। मैं कभी ये नहीं मान सकता की किसी आक्रामक का सशस्त्र  प्रतिरोध करना कभी गलत या अन्याय पूर्ण भी हो सकता है। प्रतिरोध करने और अगर संभव हो तो ऐसे शत्रु को बलपूर्वक वश में करना को मैं एक धार्मिक और नैतिक कर्तव्य मानता हूँ।  मुसलमान अपनी मनमानी कर रहे थे, या तो कांग्रेस उनकी इच्छा के सामने आत्मसर्पण कर दे और उनकी सनक ,मनमानी और आदिम रवैये के स्वर में स्वर मिलाये या उनके बिना काम चलाये, वे अकेले ही हर वस्तु और व्यक्ति के निर्णायक थे।

महात्मा गाँधी अपने लिए जूरी और जज दोनों थे। गाँधी जी ने मुस्लिमों को खुश करने के लिए हिंदी भाषा के सौंदर्य और सुन्दरता के साथ बलात्कार किया। गांधी जी के सारे प्रयोग केवल और केवल हिन्दुओ की कीमत पर किये जाते थे। जो कांग्रेस अपनी देश भक्ति और समाजवाद का दंभ भरा करती थी। उसी ने गुप्त रूप से बन्दूक की नोक पर पाकिस्तान को स्वीकार कर लिया और जिन्ना के सामने नीचता से आत्मसमर्पण कर दिया। मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के कारण भारत माता के टुकड़े कर दिए गए और 15 अगस्त 1947 के बाद देश का एक तिहाई भाग हमारे लिए ही विदेशी भूमि बन गई। नेहरु और उनकी भीड़ की स्वीकारोक्ति के साथ ही एक धर्म के आधार पर अलग देश बना दिया गया

इसी को वे बलिदानों द्वारा जीती गई स्वतंत्रता कहते है। और, किसका बलिदान ? जब कांग्रेस के शीर्ष नेताओ ने गाँधी जी की सहमती से इस देश को काट डाला, जिसे हम पूजा की वस्तु मानते है तो मेरा मस्तिष्क भयंकर क्रोध से भर गया। मैं साहस पूर्वक कहता हूँ की गाँधी अपने कर्तव्य में असफल हो गए। उन्होंने स्वयं को पाकिस्तान का पिता होना सिद्ध किया। मैं कहता हूँ की मैंने गोलियां एक ऐसे व्यक्ति पर चलाई थी, जिसकी नीतियों और कार्यो से करोड़ों हिन्दुओं को केवल बर्बादी और विनाश ही मिला। ऐसी कोई क़ानूनी प्रक्रिया नहीं थी जिसके द्वारा उस अपराधी को सजा दिलाई जा सके, इसीलिए मैंने इस घातक रास्ते का अनुसरण किया। मैं अपने लिए माफ़ी की गुजारिश नहीं करूँगा ,जो मैंने किया उस पर मुझे गर्व है। मुझे कोई संदेह नहीं है की इतिहास के ईमानदार लेखक मेरे कार्य का वजन तोल कर भविष्य में किसी दिन इसका सही मूल्यांकन करेंगे। जब तक सिन्धु नदी भारत के ध्वज के नीचे से ना बहे तब तक मेरी अस्थियो का विसर्जन मत करना।

 

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