amit-shah-bs-yeddyurapaतमाम सियासी उठापटक के बाद कर्नाटक में नई सरकार की तस्वीर साफ हो गई। आखिर में कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर सरकार बना ली। इसी चुनाव से आगामी लोकसभा चुनाव की सारी रणनीति साफ हो गई। शुक्रवार शाम तक सुगबुगाहट थी कि बीजेपी के पक्ष में आंकड़े आ चुके हैं लेकिन आखिरी मौके पर हुए बदलाव से सारी कहानी बदल गई। ऐसे में कुछ एक सवाल है जो साफ कर रहे हैं कि बीजेपी ने एक रणनीति के तहत इस हार को स्वीकार किया है।

चुनाव से पहले छवि साफ करने की कवायद

पिछले कुछ चुनावों में बीजेपी ने कई अनिश्चिताओं के बादल के बीच सरकार बनाने में कामयाबी पाई, जम्मू कश्मीर, नागालैंड और गोवा इसके उदाहरण है। इन राज्यों में सरकार बनाने के बाद मोदी और शाह पर आरोप लगते रहे कि वह विधायकों की खरीद फरोख्त करके सरकार बनाते हैं। अब कर्नाटक के चुनाव में हुई खरीदी-बिक्री की गणित, आगामी लोकसभा चुनाव तक धुंधली पड़ जाएगी। बीजेपी आक्रमकता के साथ कांग्रेस को घेर सकेगी कि दूसरी बड़ी पार्टी होने के बावजूद कांग्रेस ने शर्तों पर उनके साथ गठबंधंन किया, जिन पर चुनाव से पहले आरोप लगाया करते थे।

विपक्ष की भूमिका

कांग्रेस की छवि एक कमजोर विपक्ष बनकर सामने आई। कई राज्यों से लेकर केंद्र तक, विपक्ष में कांग्रेस कुछ करिश्मा करने में नाकाम रही। ऐसे में बीजेपी कर्नाटक में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद विपक्ष में बैठेगी और कर्नाटक की सरकार की नाक में दम करेगी। साथ ही संदेश दिया जाएगा कि कांग्रेस विपक्ष में कमजोर रहती है और सरकार भी कमजोरी से चला रही है।amit-shah-rahul-gandhi

येदियुरप्पा का इमोशनल कार्ड

येदियुरप्पा को बीजेपी एक बार फिर अपना ट्रंप कार्ड बनाकर इस्तेमाल कर सकती है। क्योंकि विगत विधानसभा चुनाव में लिंगायतों में बीजेपी के प्रति विश्वास बढ़ा है। लोकसभा चुनाव से पहले येदियुरप्पा एक बार फिर जनता के बीच जाकर अपील कर सकेंगे कि हमारे साथ धोखा हुआ। निश्नित तौर पर इसका फायदा बीजेपी को मिलेगा।

मोदी और शाह ने उन राज्यों में सरकार बना ली जहां उनके विधायकों की संख्या आधा दर्जन भी नहीं थी। ऐसे में ये स्वीकार करना मुश्किल है कि बीजेपी ने कर्नाटक जैसे राज्य के लिए पूरे जोर शोर से प्रचार किया होगा।

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