धार्मिक

वो स्थान जहां है स्वर्ग की सीढ़ी, दशानन रावण जाना चाहता था देवलोक !

स्वर्ग की सीढ़ी

नई दिल्ली(रिपोर्ट अड्डा): भारत के इतिहास में अनेकों ऐसे किस्से हैं जिनके बारे में किसी को नहीं पता है। रामायण, महाभारत के किस्सों की प्रमाणिकता साबित करने के लिए कई ऐसे साक्ष्य और तथ्य हैं जिनके बारे में आपको नहीं पता होगा। क्या आपको पता है कि रामायण काल में लंकापति दशानन रावण ने अमर होने के लिए भगवान शंकर की कठोर तपस्या की थी। वो अमर होना चाहता था। भगवान शंकर ने उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिए, और उसकी अमर होने की इच्छा पर कहा कि अगर वो एक दिन में पांच पौड़ियां बना लेगा तो वो अमर हो जाएगा। अमरता और रावण के बीच में एक दिन में पांच पौड़ियां का फासला था।

भगवान शंकर के आशीर्वाद के बाद रावण एक दिन में पांच पौड़ियां बनाने में जुट गया। आज हम आपको लेकर चलेंगे उस जगह जहां पर रावण ने ये पौड़ियां बनवाई थी। जिनके जरिए वो स्वर्ग जाना चाहता था। इनको स्वर्ग की सढ़ी भी कहते हैं। हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में स्थित है वो जगह, यहीं के एक मंदिर में रावण ने स्वर्ग जाने के लिए सढ़ी बनाई थी। भोलेनाथ का ये मंदिर सिरमौर जिला के मुख्यालय नाहन से 6 किलोमीटर दूर है। यहीं पर रावण ने भोलेनाथ के कथन के मुताबिक पांच पौड़ियां बनाने का काम शुरू किया था। रावण ने पहली पौड़ी हरिद्वार में बनाई थी। जिसे हर की पौड़ी के नाम से जाना जाता है.

रावण ने दूसरी पौड़ी, पौड़ी गढ़वाल में बनायी थी।  तीसरी पौड़ी उसने चुडेश्वर महादेव में बनाई जबकि चौथी पौड़ी किन्नर कैलाश में बनायी थी। इस तरह से रावण अमरता के नजदीक पहुंच रहा था। लेकिन भगवान भोलेनाथ की महिमा अपरंपार है। वो जानते थे कि अगर रावण अमर हो गया तो वो धरती का नाश कर देगा। पूरी धरती पर दैत्यों का राज हो जाएगा। वो देख रहे थे कि रावण एक दिन में पांच पौड़ियां बनाने के करीब है। जब रावण पांचवी पौड़ी का निर्माण कर रहा था तो उसे नींद आ गई। जब वो सोकर उठा तो देखा सवेरा हो गया था। इस तरह से वो पांच पौड़ियां नहीं बना पाया और अमर नहीं हो पाया.

सिरमौर जिले में महादेव के इस मंदिर की महिमा बहुत ज्यादा मानी जाती है। यहां पर पूरे देश से भक्त आते हैं। कई लोग तो केवल ये देखने के लिए आते हैं कि क्या वाकई में यहां पर स्वर्ग की सीढ़ियां हैं। इस मंदिर से जुड़े हुए अमेक किस्से हैं। उनमें से एक है कि एक बार विष्णु भगवान ने पुत्र प्राप्ति के लिए तपस्या की थी। उनके तप से प्रसन्न हो कर ऋषि मृकंडू ने उन्हें पुत्र का वरदान दिया था। साथ ही ये भी कहा था कि वो पुत्र 12 साल ही जी पाएगा। उस पुत्र का नाम मार्कंडेय रखा गया. उन्होंने अमर होने के लिए लगातार महामृत्युंजय जाप किया। जब यमराज उनको लेने के लिए आए तो मार्कंडेय ने शिवलिंग को पकड़ लिया। उसके बाद भोलेनाथ ने उनको दर्शन दिए और अमर होने का वरदान दिया।

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