supremecourt

नई दिल्ली(रिपोर्ट अड्डा):  16 Dec 2012 की वो रात दिल्ली के चेहरे पर एक बदनुमा दाग की तरह बन गई। निर्भया दिल्ली में 16 दिसम्बर 2012 के बहुचर्चित बलात्कार और हत्या की अपराधिक घटना की पीड़िता को समाज और मीडिया द्वारा दिया गया नाम है।कोई नाम ना होने का ही शायद यह असर था कि भारत की पूरी जनता ने धर्म, जाति-पाति से ऊपर उठकर निर्भया से खुद को जुड़ा हुआ महसूस किया। मीडिया ने भी जनता की पुरजोर वकालत की और सरकार को जनता के कठघरे में खड़ा कर दिया। सरकार को उसकी जिम्मेदारी का एहसास करवाया। निर्भया ने साहस के साथ जिंदगी की जंग लड़ी। हमेशा के लिए सोने से पहले सिस्टम और जनता को जगा कर चली गई।

5 साल बाद भी यह घटना हर देशवासी के जहन में छाया है। 5 साल की लम्बी अवधि भी इस घटना को हम भारतीय के जहन से इसे मिटाने में कामयाब नहीं हुई । 16 Dec 2012 की उस काली रात में एक चलती बस में 5 बालिग और 1 नाबालिग दरिंदे ने 23 साल की निर्भया के साथ हैवानियत का जो खेल खेला, उसे जानकर पूरे देश की जनता की रूह कांप उठी थी।

निर्भया उस रात फिल्म देखने के बाद अपने एक मित्र के साथ बस में वापस लौट रही थी। बस में केवल 5 से 7 यात्री थे। अचानक वे सभी निर्भया के साथ छेड़ छाड़ करने लगे और उस पर फब्तियां कसने लगे। बस में उनके अलावा कोई और नहीं था। निर्भया के मित्र ने इस बात का विरोध किया। उनलोगों ने उसके साथ भी मारपीट शुरू कर दी। जब उसका मित्र बेहोश हो गया तो उन दरिंदों ने निर्भया के साथ बलात्कार की कोशिश की। उस बहादुर लड़की ने उन दरिंदों का डटकर विरोध किया परन्तु जब वह संघर्ष करते करते थक गई तो उनलोगों ने उससे बेहोशी की हालत में सामूहिक बलात्कार किया। उन वहशी दरिंदों ने यहां तक की उसके यौनांग में व्हील जैक की रॉड घुसाकर बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया। बाद में उन वहशियों ने उन दोनों को एक निर्जन स्थान पर बस से फेंककर भाग गए।

किसी तरह उन्हें दिल्ली के सफदर जंग अस्पताल में भर्ती कराया गया। पर वहां उस पीड़िता की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। उसकी हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती गई। 26 Dec 2012 को उसे इलाज के लिए सिंगापुर के माउंट एलिजाबेथ अस्पताल ले जाया गया। जहां 29 Dec 2012 को निर्भया की आत्मा ने अपने शरीर का त्याग कर अथाह कष्ट से मुक्ति पाई। 30 Dec को उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया।
निर्भया की मौत के बाद दिल्ली में हाई अलर्ट जारी किया गया। शोकग्रस्त देश ने निर्भया को नम आँखों से श्रद्धांजलि दी।

इस मामले की गूंज सोशल मीडिया , सड़को से होता हुआ देश की संसद तक जा पहुंचा। पूरा देश सड़क से संसद तक निर्भया के साथ था। निर्भया की मौत ने लोगों को आक्रोशित कर दिया। जगह जगह इकट्ठा होकर लोगों ने इस घटना का विरोध किया।

पुलिस ने बस ड्राइवर राम सिंह को गिरफ्तार किया। जिसने पूछताछ में अपना अपराध स्वीकार कर लिया था। उसी की निशानदेही पर पुलिस ने उसके भाई मुकेश, एक जिम इंस्ट्रक्टर विनय गुप्ता और फल विक्रेता पवन गुप्ता को गिरफ्तार किया था। पुलिस ने मामले में 80 लोगों को गवाह बनाया था। कुल मिलाकर 6 आरोपी थे। सुनवाई हो रही थी। मगर इसी बीच 11 मार्च 2013 को आरोपी बस ड्राइवर ने जेल में ही आत्महत्या कर ली। नाबालिग मुकेश ने वारदात में मौजूद होने की बात कबूली। नाबालिग मुकेश सुधार गृह की अपनी तीन साल की सजा पूरी कर चुका है।जबकि, अन्य आरोपियों विनय शर्मा, अक्षय ठाकुर और पवन गुप्ता ने सुनवाई के दौरान इन आरोपों को झुठला दिया।

इस मामले में विशेष तौर पर गठित त्वरित अदालत ने 12-14 सितम्बर को चारों बालिग आरोपियों को फाँसी की सजा दे दी। आज फिर सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले पर कायम रहते हुए उन चारों की फाँसी की सजा बरकरार रखी।

सुप्रीम कोर्ट का आज का फैसला एक बार फिर पूरे मुल्क की महिलाओं के सम्मान से खेलने वालों के लिए बड़ी लकीर खींचने वाला साबित हुआ है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने एक बार फिर फिर से भारत की न्याय व्यवस्था पर जनता के विश्वास को मजबूती प्रदान की।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *