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रियो 2016 से पदक नहीं सीख मिली है, संभले नहीं तो 3016 में भी पदक नहीं आएगा

2016-olympics

नई दिल्ली (ब्यूरो, रिपोर्ट अड्डा): भारत एक बढ़ता और विस्तारित होता देश है। हर स्तर पर हिंदुस्तान तरक्की कर रहा है। आंकड़े कहते हैं कि हिंदुस्तान की आबादी में सबसे ज्यादा युवाओं की संख्या है। लेकिन फिर भी हम खेलों के मामले में फिसड्डी साबित हुए। 125 करोड़ की आबादी वाले देश में हम ओलंपिक जैसे खेल के महाकुंभ में 67वें नबंर पर आए।

हार और जीत तो खेल का हिस्सा है। लेकिन 119 लोगों के दल में एक भी गोल्ड मेडल नहीं आना चिंता का विषय है। क्या सिर्फ अच्छा नहीं खेलने की वजह से हम पदक लाने में नाकाम हुए है। निश्चित तौर पर नहीं, खिलाड़ियों के साथ साथ पूरा देश इसके लिए जिम्मेदार है। इस बार ये ओलंपिक हमे सीख देकर खत्म हुआ है। सीख इस बात की हमे लड़कियों के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा।

2016 के इस महाकुंंभ में जो 2 मेडल हमारे हिस्से में आए वो लड़कियां ही लाई। ऐसी कई लड़कियों को हमने पीवी सिंधु और साक्षी मिताली बनने से पहले ही मार दिया। खेल के प्रति हमारा नजरिया इस बात का सबूत है कि हम खेलों को सिर्फ मनोरंजन तक ही सीमित रखते है। बेटियों और बेटों को वो मंच नहीं दिलवा पाते है जो उन्हे ओलंपिक में मेडल दिलवा सके।

समाज में खिलाड़ियों को वो सम्मान नहीं मिल पाता है जिससे वो उत्साहित हो सके, इसके उलट हम खिलाड़ियों की प्रतिभा पर सवाल उठाते है। ऐसे कई खिलाड़ी हैं जो देश का नाम रौशन करने के बाद रोजमर्रा की जिंदगी में जूझ रहे होते हैं। ऐसे में किसी भी खिलाड़ी से मेडल की उम्मीद करना भी बेईमानी होगी।

2016 में हुआ ओलंपिक हमे ये भी सिखा गया कि सिस्टम की वजह से हम पीछे रह गए। नरसिंह यादव का मामला इस बात का जीता जागता उदाहरण है। मेडल के लिए सिर्फ खिलाड़ियों की जरूरत नहीं होती है बल्कि देश के समर्थन और सही सिस्टम की भी जरूरत होती है। रियो की समाप्ति के बाद विश्लेषण कहता है कि अगर हालात नहीं बदले तो 2016 के बाद कई स्तरों पर बदलाव करना होगा। अगर ये बदलाव नहीं किए गए तो साल 3016 के ओलंपिक में भी मेडल लाना मुश्किल हो जाएगा ।

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