लालू का मंतर सीख लिए हैं नीतीश, अबरी दुनौ जने जइहैं’

बिहार के गांवों में घूमते हुए कई बार कुछ टोलों में जाकर लगता है कि शायद ‘विकास’ चलते चलते थक गया औऱ यहां तक नहीं पहुंच पाया. या फिर यूं कहें कि विकास को रास्ता दिखाने वालों को गांवों के इन टोलों की राहें याद नही रही. लेकिन चुनाव आते ही इन टोलों का नक्शा उन्हीं लोगों को सोते जागते हर वक्त दिखने लगा है. दिखना जरूरी है क्योंकि इन टोलों की राहें ही उन्हें सत्ता के राजपथ तक पहुंचाएंगी. जी हां, आज बात महादलित औऱ अति पिछड़ों वोटर की. ये वो वोटर है जिसके पास बिहार के चुनाव में सत्ता की चाबी है. दोनों ही गठबंधन इस वर्ग के वोटर को अपनी तरफ करने में लगे हुए हैं. आज लिखते समय भी एक आवाज कानों में गूंज रही है “जब वोट पड़ना होता है तो नेता लोग अपने मरद औऱत बाले-बच्चे सब आ जाते हैं, तब सबको हमारी याद आती है बाकी दिन तो हम जिन्दा हैं कि मर गए ये झांकने भी नही आते” . हम जहां भी गए जिस भी टोले में गए वहां ये आवाज जरूर सुनने को मिली.

पटना से जहानाबाद जाते हुए हमने तय किया मखदूम विधानसभा क्षेत्र में ही चलते हैं. यहां से एनडीए के बिहार के पोस्टर ब्वाय जीतन मांझी मौजूदा विधायक होने के साथ साथ उम्मीदवार भी हैं. मांझी और एनडीए की पैठ भांपने के लिए सबसे वाजिब लगा कि सीधे मुसहर टोले जाया जाय. दोपहर का वक्त था जब हम वहां पहुंचे. एक घर के सामने रूक हमने बातचीत शुरू की. जिस तरह का जवाब मिला वो चौकाने वाला था. महिलाओं ने एक सुर से नीतीश कुमार को अपना सीधा समर्थन दिया. ये पूछने पर आप लोगों के लिए मांझी जी औऱ नीतीश जी में ज्यादा अच्छा किसने कया. महिलाओं के बीच से आवाज आयी नीतीश जी तो छात्रवृति दिए, कपड़ा दिए, साईकल दिए हमारे बच्चों को, बीपीएल कार्ड दिए सब तो वो किए मांझी क्या किए हमारे लिए. बातचीत में कहीं लालू यादव का जिक्र आया तो एक महिला आवाज आयी लालू यादव क्या किए कुछ नही किए हम सबकी जिन्दगी बरबाद कर दी, जो किए हैं नीतीश कुमार किए हैं. मौका देख मैने पूछा लेकिन अब तो नीतीश जी के साथ लालू जी हैं दोनों साथ हैं. तेज आवाज आयी साथ हैं “तो क्या हुआ उपर तो नीतीशे जी रहेंगे, लालू यादव तो नीचे ही रहेंगे”. यानि इन्हें कोई भ्रम नही था कि अगर वो महागठबंधन को जितायेंगे तो सीएम नीतीश कुमार ही होंगे. बिहार में हाल ही में स्कूलों में छात्रवृति औऱ पोशाक के लिए पैसे बंटे हैं. जिसकी याद इनके मन में अभी ताजा है.

टोले के मुंहाने पर मर्दों की टोली मिल गयी. चुनाव की चर्चा छिड़ते ही फिर सवालों के घेरे में मांझी और मोदी दिखे. “मोदी जी तो सिर्फ विदेश घूम रहे हैं, फुर्सत होगी तब ना यहां कुछ करेंगे. पूरा देश उनको दे दिया बिहार भी तो उसमें ही आता है तो विकास का काम करें” . “मोदी के राज में तो मुर्गा से ज्यादा महंगा प्याज हो गया है. दाल खाने से मन को रोकना पड़ रहा है. क्या काम की बात आप कर रही हैं”. कुछ लोगों को इस बात से नाराजगी थी कि नीतीश कुमार ने जीतन मांझी को सीएम बना दिया लेकिन मांझी ने ऐसा किया कि फिर से बस विधायक बनकर रह गए.

पास के रविदास टोले में गए तो वहां मुसहर टोले के मुकाबले संपन्नता थोड़ी ज्यादा दिखी लेकिन आवाजें बिल्कुल वैसी ही थीं. यहां एक पिता ने कहा कि “क्या नहीं किए नीतीश कुमार. आज हमारी लड़कियां साईकल पर स्कूल जाती हैं, पांच पांच कोस ट्यूशन जाती हैं लेकिन किसी माई के लाल में दम नही कि उन्हें कुछ बोल सके. पहले हम कहां सोच सकते थे ये सब. जान अटकी रहती थी चिन्ता के मारे”. पुरूषों से ज्यादा तेज आवाज महिलाओं की निकल रही थी. हम यहां से ये सोचते हुए निकले कि क्या मांझी वाकई उतने मजबूत हैं जमीन पर जितना बीजेपी सोच रही है और अगले गांव में पहुंचे. यहां जो लोग मिले उनकी राय पहले से बिल्कुल अलग थी. जोर देकर कहा कि हम मांझी हैं औऱ जीतन राम मांझी को ही वोट देंगे. कुछ भी वो हमारी जाति के हैं. वोट उनको हीं देंगे.

अगले दिन हम थे हाजीपुर वैशाली की तरफ. पासवान वोटर को टटोलने की कोशिश की तो वहां कोई भ्रम नहीं दिखा. उनके लिए रामविलास पासवान उनके नेता औऱ नरेन्द्र मोदी बिहार में विकास की इकलौती उम्मीद. यहां भी परिवारवाद पर यादव वोटर की तरह का ही जवाब मिला कि सबलोग अपने बच्चे को ही अपने काम की विरासत देते हैं तो अगर रामविलास पासवान ऐसा कर रहे हैं तो क्या गलत है. जानकारों की राय में बिहार में पासवान वोटर उसी गठबंधन को वोट देते हैं जिसके साथ रामविलास पासवान रहते हैं. यानि बीजेपी इस वोटर की तरफ से निश्चिंत रह सकती है.

यहां से आगे बढ़े तो हम पहुंचे मल्लाहों के एक टोले में. यहां सबसे पहले एक बुजुर्ग मिले जो हर नेता औऱ दोनों गठबंधन से नाराज थे. लेकिन जब धीरे धीरे टोले के पुरूष औऱ महिलाएं जुटीं तो तस्वीर कुछ औऱ उभरी. यहां नीतीश कुमार के दस साल के शासन में पहले पांच साल के लिए तो पूरे नंबर थे लेकिन बीजेपी का साथ छोड़ने पर नाराजगी थी. और उससे भी ज्यादा गुस्सा था लालू प्रसाद यादव के साथ पर. एक बुजुर्ग ने कहा कि “पहले ठीक थे लेकिन अब लालू यादव का मंतर सीख लिए हैं. लाठी को तेल पिलाने वाला मंतर. अबरी दुनौ जने जइहैं” . तो एक ने कहा कि “हमारी दिक्कतों पर उनका ध्यान नहीं है. 2014 में भी नरेन्द्र मोदी को जिताये थे औऱ इस बार भी उन्ही को वोट देंगे” . महिलाओं में सबसे ज्यादा असर दिखा जन धन योजना का. एक महिला ने कहा कि “पहले खाता खुलवाने जाते थे तो हज़ार रूपया मांगते थे और अभी इतना अच्छा हो गया, बिना पैसे के खाता खुल रहा है. जो भी दो चार पैसा बचता है जाकर बैंक में रखने की जगह तो मिल गयी “. कुछ महिलाएं बाद में ये सोच आयी शायद फोटो किसी योजना के लाभ के लिए लिया जा रहा है, उनका मत भी परिवर्तन के पक्ष में था.

अगले गांव में मिले वोटर खुल कर तो कुछ नहीं बोल रहे थे. लेकिन इशारे इशारे में रूझान बता रहे थे. गांव से बाहर निकल सड़क के साथ लगी एक दुकान के मालिक से बात होने लगी. उनका साफ कहना था कि जो जीतेगा हम उसके साथ जाएंगे. काफी कुरेदने के बाद इन्होंने कहा कि अभी तो ऐसा लग रहा है कि नरेन्द्र मोदी ही जीत रहे हैं. जहानाबाद से वैशाली तक की यात्रा में जिन मतदाताओं से हमने बात की उसमें साफ दिख रहा था कि मत बंटे हुए हैं. कहीं महागठबंधन का पलड़ा भारी नज़र आता तो अगले गांव में एनडीए की बढ़त साफ दिखती. यही वो बंटवारा है जो बिहार के चुनाव में दोनों ही गठबंधनों को चैन नही लेने दे रहा है. दोनों ही गठबंधन के कोर वोटर उनके साथ हैं लेकिन असली चुनौती अतिरिक्त वोट जोड़ने की है. वही पर महादलित औऱ अतिपिछड़ा वोटर की अहमियत बढ़ जाती है. दोनों ही गठबंधन को मालूम है जितना ज्यादा अतिरिक्त वोट वो यहां से अपने पाले में जोड़ेंगे सत्ता से उनकी दूरी उतनी ही कम होती जाएगी. इसीलिए दोनों के ही विकास में लिपटे जातिगत सोशल इंजीनयरिंग का चुग्गा इनकी तरफ फेंक रहे हैं. लेकिन अभी तक मुकम्मल तौर पर ये तय नही पाया है कि किसका चुग्गा इन्हें ज्यादा असरदार लग रहा है.

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