sant ne vaishya ko bna liya apna guru

 sant ne vaishya ko bna liya apna guru

नई दिल्ली (रिपोर्ट अड्डा): ये हमारे देश की पौराणिक परम्परा है। ना केवल वैदिक काल मे बल्कि ये  उक्ति आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। पौराणिक काल से लेकर आज तक गुरु शिष्य परम्परा की अनेको कहानियाँ प्रचलित है। जो हमे प्रेरणा देती आई है। चाहे वो महात्मा बुद्ध और अंगुलिमाल की प्रेरक कथा हो या फिर महाभारत काल की द्रोणाचार्य और एकलव्य की प्रसिद्द कथा। इनके अलावा भी कई प्रचलित कहानियां हैं।

इसी कड़ी मे एक और प्रचलित कहानी है।जब एक संत ने एक वेश्या को अपना गुरु बनाया। एक बहुत प्रसिद्द संत थे। दूर दूर से लोग उनसे मिलने और ज्ञान प्राप्त करने आते थे। उनके गुणों से प्रभावित हो एक वेश्या भी उनसे मिलने आई। उसने उस संत से अकेले मे मिलने की विनती की। लेकिन लोकापवाद की खातिर संत ने हमेशा उसकी विनती को ठुकराया।

अनगिनत बार विनती ठुकराये जाने क बाद भी वो वेश्या उस संत के पास अपनी विनती ले के रोजाना आती रही। यह क्रम लगातार कई दिनों तक चलता रहा। एक दिन उस संत ने झल्लाकर उस वेश्या से कहा की तुम हमेशा अधर्म के कार्य मे लिप्त रही। मैं तुम्हारा गुरु बनना स्वीकार नही कर सकता।

संत की पूरी बात सुनने के बाद वेश्या ने कहा मैं आपको अपने मेहनत से कमाया एक रुपया समर्पित करना चाहती थी। जो मैंने अपने पिता के साथ मजदूरी कर कमाया। ये एक रुपया ही है जो मेरे धर्म की कमाई है। आपके शिष्य आपको लाखो रुपये समर्पित कर रहे उनके सामने मुझे ये एक रुपया देंते हुए शर्मिंदगी महसूस हो रही थी। इसलिए मैंने आपसे अकेले मिलने की विनती की।

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वेश्या की बातों को सुन कर संत आश्चर्यचकित रह गए। वेश्या का धैर्य और धर्म के प्रति सम्मान देख के संत ने उसे अपना गुरु बना लिया। संत ने कहा तुम्हारा सर्वश्रेष्ठ गुण तुम्हारा धैर्य है। जिसने तुम्हे तुम्हारे मार्ग से डिगने नही दिया। प्रचलित कहानियां कई तरह की सीख हमें दे जाती हैं। आपने देखा कि किस तरह से वेश्या के धैर्य से वो संत प्रभावित हो गए और उसे अपना गुरू तक बना लिया।

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