इस भारतीय शूरवीर का नाम सुनकर, आज भी थर-थर कांपते हैं अफगानी

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भारत के इतिहास को क्यों गौरवशाली कहा जाता है… अगर इस पर संदेह हो तो एक भर इतिहास के पन्नो को उलट पलट के देख लें. पूरा इतिहास भारतीय शूरवीरों की शौर्यगाथा से भरा हुआ है. महाराणा प्रताप, शिवाजी जैसे योद्धाओं ने दुश्मनों को हर मोर्चे पर खदेड़ा. वीरों की इस सूची में ऐसा ही नाम आता है हरी सिंह. सिख योद्धा हरी सिंह नलवा के नाम भर से दुश्मनों के गले सूख जाते थे. उनके गुस्से से दुश्मन तो क्या खुद अपने साथी भी डरते थे.

हरी सिंह नलवा का जन्म 17वीं शताब्दी के आखिर में हुआ था. इतिहासकारों के मुताबिक हरी सिंह का जन्म गुजरावाला में हुआ था. वो बचपन से ही प्रतिभावान थे. उनके युद्ध लड़ने के शौक ने उन्हें बचपन में ही मैदान का निपुण बना दिया था. हरी सिंह जब सिर्फ 14 साल के थे तब वो तलवारबाजी और भला फेंकने में महारत हासिल कर चुके थे. दूर गाँव से लोग सिर्फ हरी सिंह के युद्ध कौशल का नजारा देखने के लिए आते थे. बताया जाता है की जब वो युद्ध का अभ्यास किया करते थे तो भारी संख्या में लोग देखने के लिए आते थे.

अपने कौशल की वजह से उन्हें महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी सेना में कम उम्र में ही शामिल कर लिया. 1837 तक हरी सिंह ने 20 बड़े युद्ध में हिस्सा लिया. हर युद्ध में परीस्थितयां हरी सिंह के खिलाफ रहीं लेकिन वो हर बार दुश्मनों का धुल चाटने में कामयाब रहे. हरी सिंह का नाम उन सेनापतियों में शुमार किया जाता है जिन्होंने लंबे समय तक खैबर पास पर अपना नियंत्रण बनाये रखा था.

मान सिंह ये एक युद्ध के दौरान हरी सिंह बुरी तरीके से घायल हो गए थे लेकिन वो तब तक युद्ध में बने रहे जब तक दुश्मनों को पीछे धकेल नहीं दिया. इसी तरह दोस्त खान से युद्ध के दौरान भी हरी सिंह बुरी तरीके से घायल हो गए थे लेकिन मुस्कुराते हुए किले के अंदर आ गए. हरी सिंह जब अंतिम साँसे ले रहे थे तब उन्होंने आदेश दिया कि मेरी मौत की खबर किले से बहार नहीं जानी चाहिए, उन्होंने कहा की मौत के बाद मेरे शरीर को घोड़े पर बिठाकर खड़ा कर दिया जाए. उनके सिपहसिलारो ने ऐसा ही किया, और अफगान सेना 7 दिनों तक किले के अंदर प्रवेश नहीं कर पाई थी. अफगानियों को लगा कि योद्धा अभी तक किले की रक्षा के लिए खड़ा हुआ है.