congress ke paas jaakar bure phanse prashant kishor

नई दिल्ली (रिपोर्ट अड्डा): 2012 में गुजरात विधानसभा और 2014 के लोकसभा चुनाव में अपना जादू चलाने के बाद प्रशांत किशोर सुर्खियों में आए। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में जेडी (यू), आरजेडी, कांग्रेस के महागठबंधन के पीछे प्रशांत किशोर ही थे। प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार के साथ बिहार में व्यापक प्रचार अभियान चलाया और नीतीश कुमार को विजय श्री दिलवाने में अहम भूमिका निभाई।

चुनावी रणनीतिकार, पोल मैनेजमेंट गुरु, चुनावी चाणक्य जैसे नामों से मशहूर प्रशांत किशोर को चुनावों में जीत की गारंटी माना जाने लगा।
BJP और जदयू के बाद प्रशांत किशोर ने कांग्रेस को जीत दिलवाने का जिम्मा लिया। प्रशांत किशोर की रणनीति की बदौलत ही बिहार में कांग्रेस कोे 27 सीटें मिली। लेकिन, असम में उनका दांव नहीं चला और कांग्रेस की 15 साल पुरानी सरकार धराशायी हो गई। लेकिन, यूपी के चुनावी नतीजे ने तो उनकी कार्यशैली पर सवाल खड़ा कर दिया हैं।

यूपी चुनाव में राजनीतिक पार्टियों से अलग किसी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी थी तो वो थे चुनावी चाणक्य प्रशांत किशोर। पीके यूपी चुनाव में कांग्रेस के मास्टर रणनीतिकार थे। 2017 के यूपी, उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव में पीके की कार्यशैली में वो पहले वाली धार नजर नहीं आई। उत्तराखण्ड में तो हरीश रावत तक चुनाव हार गए।

पीके ने यूपी में कांग्रेस की खोयी शाख को वापस लाने के लिए पूरी योजना तैयार की। सपा कांग्रेस गठबंधन भी उन्हीं की दें है। रातोंरात राहुल और अखिलेश एक पोस्टर में नजर आने लगे। यूपी को ये साथ पसन्द है का नारा भी पीके की रणनीति का हिस्सा था और राहुल गांधी की खाठ सभा भी। 27 साल यूपी बेहाल का नारा हो या ब्राह्मण कार्ड खेलते हुए शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाना हो सभी पीके की रणनीति में शामिल था। लखनऊ में वॉर रूम बनाया। जातिगत और धार्मिक आंकड़ा तैयार कर टिकट वितरण किया गया। राहुल-अखिलेश की सभी साझा रैलियों की स्क्रिप्ट भी पीके की टीम तैयार करती थी। लेकिन, असम की तरह यहां भी पीके की रणनीति काम नहीं आई। पीके के सभी दावे खोखले साबित हुए।

पीके प्रबंधन के विद्यार्थी है वो सिर्फ माहौल खड़ा कर सकते है। सिर्फ प्रशांत किशोर के भरोसे कोई चुनाव नहीं जीता जा सकता। 2014 के लोकसभा चुनाव में BJP की लहर थी। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार राजद गठबंधन करने के बाद मजबूत स्थिति में थे। जबकि कांग्रेस में कार्यकर्ता और नेतृत्व दोनों हीमाहौल को जमीनी स्तर पर भुनाने का काम नहीं कर पाये।

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