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क्या राहुल गांधी देशविरोधी नारों का समर्थन करते हैं? अगर नहीं तो इसकी निंदा करें : अमित शाह

corruption on shoulders
बहराइच: भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर जेएनयू में देशविरोधी नारे लगाने वालों का वोट बैंक की राजनीति के लिए पक्ष लेने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि संसद में बैठे सभी पार्टियों के नुमाइंदे यह बताएं कि राष्ट्रविरोधी नारेबाजी करना अभिव्यक्ति की आजादी है या देशद्रोह।

अमित शाह ने राजा सुहेलदेव की प्रतिमा के अनावरण के अवसर पर आयोजित जनसभा में कहा, ‘आज संसद में चर्चा हो रही है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देशविरोधी नारों को सहन किया जाए या नहीं। मैं खासकर कांग्रेस और उसके कार्यकर्ताओं से पूछना चाहता हूं कि क्या जो लोग भारत विरोधी नारे लगाते हैं, वे देशद्रोही नहीं हैं।’

उन्होंने कहा, मैं चाहता हूं कि देश की सबसे बड़ी पंचायत यानी संसद में हर पार्टी के नुमाइंदे बैठे हैं, वे स्पष्ट कर दें कि इस तरह के नारे लगाना अभिव्यक्ति की आजादी है या देशद्रोह है। यह देश की जनता को भी तय करना है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को घेरते हुए अमित शाह ने कहा, मैं राहुल गांधी से पूछना चाहता हूं कि वह जनता के सामने स्पष्ट करें कि क्या वह इन नारों का समर्थन करते हैं। अगर नहीं करते हैं, तो इसकी निंदा करें।

उन्होंने कहा, राहुल जी वोट बैंक की राजनीति के लिए इतना नीचे मत उतरिये। यह देश हजारों शहीदों के जीवन की कुर्बानी के कारण आजाद हुआ। आप अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश को तोड़ने वाली ताकतों का समर्थन करते हैं।

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  • जब जिस देश में राष्ट्रीय प्रतीक तिरंगा झंडा फहराना भी असम्माननीय, अशोभनीय माना जाता हो (कांग्रेसी रीता बहुगुणा के अनुसार) और उस के सम्मान पर पग- पग पर कीचड़ उछाला जाता हो और साथ ही संविधान को भी अपने स्वार्थों की प्राप्ति हेतु पग-पग पर रौंदा जाकर मखौल उड़ाया जाता हो तो इन कथित ढोंगी देशभक्तों (जिनके खून में देशभक्ति हमेशा से भरी होना बताया जाता हो तो भी देशद्रोहियों के समर्थन में अपने ही राष्ट्रभक्तों के विरोधियों के समर्थन में खड़े रहकर देश का क्या शो कर रहे हैं?? ) की बजह से सच्चे देशभक्तों को सरेआम देश की सुरक्षा के लिए कुर्बानियाँ देकर भी खून का घूँट पीकर मन मसोसकर लाचार रह जाना पड़ता है | अफसोस !! देश की विपक्षी पार्टियों की ये छिछली घिनौनी राजनीति कहाँ जाकर रुकेगी, इसे ईश्वर भी नहीं जानता है| अपने घिनौने मकसदों से ये दल कब बाज आयेंगे, कैसे आयेंगे, कब देश का भला सोचेंगे; ये कौन सोचेगा?? क्या किया जाए, समझ में नहीं आता है | इससे अच्छा तो राजतंत्र ही अच्छा था|

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